धर्मग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण का जीवन जितना दिव्य और लीला से भरा था, उनका पृथ्वी से प्रस्थान उतना ही रहस्यमय और मार्मिक माना जाता है। यह प्रसंग मुख्य रूप से भागवत पुराण और महाभारत के मौसल पर्व में मिलता है, जहां यदुवंश के अंत का विस्तार से वर्णन है।
धर्मग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण का जीवन जितना दिव्य और लीला से भरा था, उनका पृथ्वी से प्रस्थान उतना ही रहस्यमय और मार्मिक माना जाता है। यह प्रसंग मुख्य रूप से भागवत पुराण और महाभारत के मौसल पर्व में मिलता है, जहां यदुवंश के अंत का विस्तार से वर्णन है।
कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र सांब अत्यंत शरारती स्वभाव के थे। एक दिन उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर ऋषियों का उपहास करने का विचार किया। सांब ने स्त्री का वेश धारण किया और महान ऋषियों—विश्वामित्र और नारद—के सामने जाकर पूछा, “बताइए, इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा?”
ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से छल को पहचान लिया। अपमानित होकर उन्होंने शाप दिया—“इसके गर्भ से लोहे का मूसल उत्पन्न होगा, जो पूरे यदुवंश के विनाश का कारण बनेगा।”
कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र सांब अत्यंत शरारती स्वभाव के थे। एक दिन उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर ऋषियों का उपहास करने का विचार किया। सांब ने स्त्री का वेश धारण किया और महान ऋषियों—विश्वामित्र और नारद—के सामने जाकर पूछा, “बताइए, इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा?”
ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से छल को पहचान लिया। अपमानित होकर उन्होंने शाप दिया—“इसके गर्भ से लोहे का मूसल उत्पन्न होगा, जो पूरे यदुवंश के विनाश का कारण बनेगा।”
कुछ समय बाद सचमुच सांब के गर्भ से लोहे का मूसल निकला। यदुवंशियों ने भयभीत होकर उसे चूर-चूर कर समुद्र में फिंकवा दिया, लेकिन वही लोहे के कण तिनकों के रूप में उग आए। कालांतर में प्रभास क्षेत्र में मदिरा के प्रभाव में यदुवंशी आपस में ही उन्हीं तिनकों से बने अस्त्रों से लड़ पड़े और पूरा वंश नष्ट हो गया
कुछ समय बाद सचमुच सांब के गर्भ से लोहे का मूसल निकला। यदुवंशियों ने भयभीत होकर उसे चूर-चूर कर समुद्र में फिंकवा दिया, लेकिन वही लोहे के कण तिनकों के रूप में उग आए। कालांतर में प्रभास क्षेत्र में मदिरा के प्रभाव में यदुवंशी आपस में ही उन्हीं तिनकों से बने अस्त्रों से लड़ पड़े और पूरा वंश नष्ट हो गया
कथा के अनुसार, यदुवंश के अंत के बाद वन में विश्राम करते समय शिकारी जरा ने श्रीकृष्ण के चरण को हिरण समझकर बाण चला दिया। उसी घटना के साथ श्रीकृष्ण ने अपना अवतार पूर्ण कर देह त्याग किया।
यह कथा केवल पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि अहंकार और उपहास का परिणाम कितना दूरगामी हो सकता है। धर्मग्रंथों में इसे चेतावनी और जीवन-दर्शन, दोनों रूपों में देखा जाता है।
कथा के अनुसार, यदुवंश के अंत के बाद वन में विश्राम करते समय शिकारी जरा ने श्रीकृष्ण के चरण को हिरण समझकर बाण चला दिया। उसी घटना के साथ श्रीकृष्ण ने अपना अवतार पूर्ण कर देह त्याग किया।
यह कथा केवल पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि अहंकार और उपहास का परिणाम कितना दूरगामी हो सकता है। धर्मग्रंथों में इसे चेतावनी और जीवन-दर्शन, दोनों रूपों में देखा जाता है।


Post A Comment:
0 comments: