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खंडवा (मध्य प्रदेश)।
सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित देवझिरी का भूतेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां भगवान शिव का जलाभिषेक किसी पुजारी या श्रद्धालु द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं प्रकृति करती है। यही अद्भुत परंपरा इस मंदिर को देश के विशिष्ट शिवधामों में शामिल करती है।

खंडवा शहर से लगभग 25 किलोमीटर दूर भोजाखेड़ी के समीप स्थित यह प्राचीन मंदिर आस्था, प्रकृति और रहस्य का अनूठा संगम माना जाता है।

प्राकृतिक जलधारा करती है निरंतर जलाभिषेक

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थित प्राकृतिक जलस्रोत है। पहाड़ियों के बीच स्थित एक प्राकृतिक झिरी से निकलने वाली निर्मल जलधारा बिना रुके सीधे शिवलिंग पर गिरती रहती है। यह जलधारा वर्षभर समान रूप से प्रवाहित होती है और भीषण गर्मी में भी कभी नहीं सूखती। श्रद्धालु इसे भगवान शिव का दिव्य चमत्कार और प्रकृति द्वारा किया जाने वाला अखंड जलाभिषेक मानते हैं।

स्वयंभू शिवलिंग और अमिट त्रिपुंड

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है। विशेष बात यह है कि शिवलिंग पर अंकित त्रिपुंड निरंतर जलाभिषेक के बावजूद कभी मिटता नहीं है। भक्त इसे भगवान शिव की दिव्य कृपा और इस पवित्र स्थल की अलौकिक पहचान मानते हैं।

देवझिरी नाम की अनोखी कहानी

'देवझिरी' नाम दो शब्दों से मिलकर बना है—'देव' अर्थात भगवान और 'झिरी' अर्थात प्राकृतिक जलस्रोत। मंदिर के पीछे स्थित पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच से निकलने वाली यही शीतल जलधारा इस स्थान की पहचान है। वर्षभर बहने वाला यह प्राकृतिक स्रोत मंदिर की आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ा देता है।

साधना और शिवभक्ति का प्राचीन केंद्र

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था, जहां ऋषि-मुनि, साधु-संत और अघोरी भगवान शिव की आराधना एवं तपस्या करते थे। भगवान शिव को 'भूतेश्वर' या 'भूतनाथ' के रूप में समस्त जीवों और पंचतत्वों का स्वामी माना जाता है। इसलिए यह स्थान उनकी साधना के लिए विशेष रूप से पवित्र माना जाता है।

सावन और महाशिवरात्रि पर विशेष आकर्षण

सावन माह और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक आयोजन और मेले का आयोजन होता है। चारों ओर फैली हरियाली और प्राकृतिक वातावरण भक्तों को आध्यात्मिक शांति का अद्भुत अनुभव कराते हैं।

देवझिरी का भूतेश्वर महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और आध्यात्मिक रहस्य का अद्भुत संगम है, जहां हर पल बहती जलधारा भगवान शिव के प्रति प्रकृति की अनवरत आराधना का प्रतीक मानी जाती है।


भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या केवल राम मंदिर के लिए ही नहीं, बल्कि अपने प्राचीन शिव मंदिरों के लिए भी प्रसिद्ध है। इन्हीं पवित्र स्थलों में से एक है क्षीरेश्वरनाथ महादेव मंदिर, जो श्रीराम जन्मभूमि के समीप स्थित है। सावन के पावन महीने में यहां रुद्राभिषेक और दुग्धाभिषेक के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

इस मंदिर का इतिहास रामायण काल से जुड़ा माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति की कामना से यहां भगवान शिव के शिवलिंग की स्थापना कर गाय के दूध से रुद्राभिषेक किया था। उनकी श्रद्धा और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें भगवान श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न जैसे चार दिव्य पुत्रों का आशीर्वाद प्रदान किया।

कहा जाता है कि उस समय भगवान शिव पर इतना दूध अर्पित किया गया कि वहां दूध का सागर (क्षीरसागर) बन गया। इसी कारण इस स्थान के भगवान शिव 'क्षीरेश्वरनाथ' के नाम से विख्यात हुए।

आज भी संतान सुख की कामना रखने वाले दंपत्ति यहां विशेष रूप से दुग्धाभिषेक करते हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन से पूजा और रुद्राभिषेक करने पर भगवान क्षीरेश्वरनाथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

क्षीरेश्वरनाथ महादेव मंदिर वैष्णव और शैव परंपराओं के अद्भुत संगम का प्रतीक माना जाता है और अयोध्या की समृद्ध आध्यात्मिक एवं धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है।

 


पटना। बिहार की राजधानी पटना में स्थित पंचरूपी हनुमान मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक परंपरा और अद्वितीय स्थापत्य के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। राजवंशी नगर (बेली रोड) स्थित इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां भक्तों को एक ही परिसर में बजरंगबली के छह स्वरूपों के दर्शन होते हैं। पांच स्वरूप प्रत्यक्ष रूप से स्थापित हैं, जबकि छठा स्वरूप रामदरबार में प्रभु श्रीराम की सेवा में समर्पित है। इसी कारण इस मंदिर को पंचरूपी हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है।

शहर की व्यस्त सड़क के किनारे स्थित यह मंदिर दिन-रात श्रद्धालुओं से गुलजार रहता है। स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज़ से आने वाले भक्त भी यहां हनुमान जी का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं।

हनुमान जी के पांच भाइयों की भी होती है पूजा

मंदिर के ज्योतिषाचार्य पंडित ओम तिवारी के अनुसार, ब्रह्मांड पुराण में उल्लेख मिलता है कि माता अंजना के छह पुत्र थे, जिनमें हनुमान जी सबसे बड़े थे। उनके पांच भाइयों के नाम मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान बताए गए हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार—

  • मतिमान बुद्धिमत्ता और नीति के प्रतीक माने जाते हैं।
  • श्रुतिमान वेद, शास्त्र और साहित्य के महान विद्वान थे।
  • केतुमान पराक्रमी योद्धा और अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण थे।
  • गतिमान अद्भुत गति और छलांग लगाने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध थे।
  • धृतिमान धैर्य, साहस और दृढ़ संकल्प के प्रतीक माने जाते हैं।

मान्यता है कि इन सभी गुणों का समावेश स्वयं हनुमान जी में भी विद्यमान है।

150 वर्ष पुराना ऐतिहासिक मंदिर

करीब 150 वर्ष पुराने इस मंदिर में स्थापित 25 फीट ऊंची दक्षिणमुखी हनुमान जी की प्रतिमा इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि बिहार में इतनी विशाल दक्षिणमुखी हनुमान प्रतिमा विरले ही देखने को मिलती है।

धार्मिक विश्वास है कि दक्षिणमुखी हनुमान जी की पूजा से शत्रुओं पर विजय, साहस, सफलता और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। दक्षिण दिशा को काल का प्रतीक माना गया है, इसलिए इस दिशा की ओर मुख किए हुए बजरंगबली की आराधना विशेष फलदायी मानी जाती है।

आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र

एक ही गर्भगृह में हनुमान जी और उनके पांचों भाइयों के दर्शन इस मंदिर को देश के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में स्थान दिलाते हैं। यही कारण है कि पंचरूपी हनुमान मंदिर केवल पटना ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार के प्रमुख आस्था केंद्रों में गिना जाता है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

  


नई दिल्ली। श्रावण मास की अमावस्या, जिसे सावन अमावस्या या हरियाली अमावस्या भी कहा जाता है, इस वर्ष 12 अगस्त 2026 (बुधवार) को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान, पितरों का तर्पण और दीपदान करने का विशेष महत्व है। इस बार सावन अमावस्या पर नक्षत्रों के राजा पुष्य नक्षत्र का शुभ संयोग बनने से इसका धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित मानी जाती है। इस दिन श्रद्धापूर्वक तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान करने से पितृ दोष शांत होता है तथा पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

सावन अमावस्या 2026 की तिथि

वैदिक पंचांग के अनुसार श्रावण कृष्ण अमावस्या तिथि का प्रारंभ 12 अगस्त 2026 को प्रातः 1:52 बजे होगा और इसका समापन 12 अगस्त 2026 की रात्रि 11:06 बजे होगा। उदया तिथि के आधार पर सावन अमावस्या का पर्व 12 अगस्त, बुधवार को ही मनाया जाएगा।

स्नान और दान का शुभ मुहूर्त

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और दान करना अत्यंत शुभ माना गया है।

ब्रह्म मुहूर्त:
प्रातः 4:23 बजे से 5:06 बजे तक

यदि कोई श्रद्धालु ब्रह्म मुहूर्त में स्नान नहीं कर सके, तो वह सूर्योदय के बाद भी पवित्र स्नान कर दान-पुण्य कर सकता है।

तर्पण और पितृ कर्म का महत्व

सावन अमावस्या पर पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से पितृ प्रसन्न होते हैं तथा परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार शाम के समय पितरों की स्मृति में दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे पितृलोक लौटते समय उन्हें प्रकाश का मार्ग प्राप्त होता है।

क्या करें इस दिन?

  • पवित्र नदी, सरोवर या घर में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करें।
  • पितरों के लिए तिल, कुश और जल से तर्पण करें।
  • जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, तिल, छाता या दक्षिणा का दान दें।
  • पीपल एवं तुलसी की पूजा कर दीप प्रज्वलित करें।
  • भगवान शिव और भगवान विष्णु की आराधना करें।

धार्मिक मान्यता

मान्यता है कि सावन अमावस्या पर श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए स्नान, दान और पितृ कर्म से पापों का नाश होता है, पितृ दोष शांत होता है तथा सुख, समृद्धि और पारिवारिक खुशहाली का आशीर्वाद प्राप्त होता है।